सचित्र श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण

[ हिन्दीभाषानुवाद सहित ]

दा शर्मा, पम१/#र० ए० एस०, 22 0 फप॑ 22 ७;

प्रकाशक भर

रामतनारायण लाल ४४

पब्लिशर और बुकसेलर. इलाहाबाद १९२७

प्रथम संस्करण २००० ] | मूल्य २|

विषय-सूची किष्किन्धाकाणड

प्रंथम से १-३० कामादीपन करने वाले रमणीय पम्पातोरवर्ता बनप्रदेश : को देख कर, भ्रीरामचन्द् ज्ञो का वहाँ की शोभा वर्णन करने के मिस अपने हृदयस्थ शाक्र के जह्मण के प्रति पध्कट करना। लक्ष्मण जी के ववनों से भीरामचन्ध जो का शोक कम दैना और पम्पातठ से ऋष्यहुक की श्रोर प्रस्थान दूसरा सग ३०-३६ ' सुप्रीध द्वारा ऋष्यपूक पर्वत के समीप धूमते फिरते हुए रामलहमण का देखा जाना | उनकी देख भ्रोर भयभीत हो सुम्रीच का वानरों के साथ कथोषकथन | तद्नन्तर राम- लत्तमण के मन का भेद्‌ केने के लिये भिज्ञुक के रुप में धचु- मान जो का, सुग्रीव की थाज्ञा से प्रस्थान तीसरा सगे ३६-४६ प्रथम दसुमान जी का प्रशंसादूचक वचनों से श्रोराम- चन्द्र ज्ञी की स्तुति, पीछे यह कहना कि खुप्नीच ध्यापके साथ मित्रता करना चाहते हैं। हलुमान जो को लच्छेदार बातचीत सुन श्रीरामचन्द्र जी का विस्मिव दोना ओर हनुप्तान जी की विद्यादुद्धि की बढ़ाई करना। लक््मण का हनुमान जी से कहना कि, दम भी सुप्रोव के हृढ़ हो

रहे थे

( )

चौथा सम . ४६-५४ लक्ष्मण का हनुमान ज्ञी को अपना समस्त वृत्तान्त खुनाना तथा यह भो कहना कि, फवन्थ ते कहा है कि, सीता के हरने वाल्ते को सुग्रोव जानते हैं। अतः तुम उसके पास ज्ञाओ। तदनन्तर हनुमान जी का दोनों भाइयों के सुग्नीव के समीप ले जाना पाँचवा सगे ५४-६१ दनुमान जी का सुभ्रीव को श्रीरामचन्द्र जी का समस्त बृचान्त खुनाना। खुग्रोच ओर श्रीरामचद्र जी की, अप्नि के साज्ञी कर, मेत्री दाना और भ्रीरामचर्द्ध जो का सुभीच को ढांहस वेधाना छठवाँ सग ६२--६७ सुप्रीव का भ्रीरामचन्द्र जो को रावण द्वारा सीता के हरे जाने का वृत्तान्त खुनाना शोर सीता द्वारा ऊपर से डाले हुए आभूषणों द्वारा अपने कथन का समर्थन करना सीता के आभूषणों के देख भ्रीरामचन्द्र जी का ढुःछी होना सातवाँ संग ६८-७३ थापस में एक दूसरे की सहायता करने के लिये श्रीराम- चन्द्र भर सुत्रीव का वचनवद्ध देना भौर एक दसरे के अपने अपने सुख दुःख की कथा सुनाना हु आठउवासग... ७४-८३ धीरामचन्द्र जी की बातों से सन्त॒ुष्ट दो खुत्नीव का शराम- चन्द्र ज्ञी से प्रेमालाप करना, फिर श्ांखों में श्रंस भर वात्नि द्वारा अपने निकाले जाने का वृत्तान्त सुना के

( हे) फिर श्रीरामचर्ध ज्ञो की अभयचाणी के छुन सुप्रीव का खस्य दो कर, संक्तेप में चालि के साथ चेर बंधने के कारण का वर्णन नवाँ सम <४-८९ सुग्रीव द्वारा वात के साथ उसके बैर बंधने का कारण विस्तार पुवक कहा जाना

+क,

दसवाँ सगे... हि ९०-९७ श्रीरामचन्द्र जी का सुग्रोव के अभय .प्रदान ग्यारहवाँ सगे . ९७-११६ श्रीरामचन्द्र जी का वल्ावल जानने के जा छुम्नीव के वालि की वीरता - का वृत्तान्त कहना, सुम्रीव

को विश्वास दिलाने के लिये श्रीरामचन्द्र ज्ञी का पैर के अंगूठे को ठोकर 'से दुन्दर्मि राक्तस करे पञ्ञर का बड़ी दूर फेक देना | वारहवाँ सगे ११७-१२६ श्रीरामचन्द्र जी का एक ही वाण से सप्तसाल दुत्तों की ' भञ्जन करना, श्रीरामचन्द्र जी के भेजे हुए खुप्रीव का वात्ि के साथ घार सुद्ध छोड़ कर ऋष्यमूक पर भाग जाना! चहाँ भ्रीरामचन्द्र ज्ञी के सामने सुश्रीव का दुखिया कर रोना, तव वालि केन मारने का कारण वतल्ाते हुए भीराम- चन्द्र जी का लक्ष्मण को श्राक्षा देना कि छुप्मीव के गज- पुष्पीलता की मोल्ा पहिना दा तेरहवाँ सर्गं १२६-१३२ वालिवध के लिये किष्किन्धा को ओर जाते हुए भीराम- चन्द्र ज्ञी का रास्ते में सतलनप्तुनि के आ्राश्मम् के देखना

( छे )

तव छुम्नीव का उन ऋषियों का माह्मत्य श्रीरामचनद्र जो के छुनाना ओर भ्रीरामचन्ध ज्ञो का उन प्लुनिप्रवरों द्वारा पुज्ञन किया ज्ञाना चौदहवाँ सगे १३२-१३७ श्रीरामचन्द्र जो की सहायता प्राप्त छुप्रीय का क्रिफिन्धा में गजना

पत्ठदवाँ सगे १३७-१४४ सुप्रीव का गर्जेन तर्जन सुन थ्रोर सुग्रीव के श्रोराम- चन्द्र जी की सहायता प्राप्त होने का अनुमान कर, तारा का अपने पत्ति वालि को लड़ने से रोकना सोलवाँ (६ सोलवाँ सग॑ १४४-१५१ तारा के रोकने पर भी वाल्नि का छुप्मीव के साथ लड़ने के ज्ञाना। वालि श्र लुग्नीच का युद्ध श्रीरामचन्द्र जी द्वारा वालि को वध | मिल सत्रहृवों सगे १५३-१६४ .. मरते हुए वालि का भ्रोरामचन्द्र ज्ञी के प्रति कझर चचन कहना अद्वारह्वाँ सम १६५-१८० वालि के आरोपों का धीरामचन्द्र जी द्वारा निराक्षरण किया जाना ओर श्रपते कर्म के युक्तियुक्त अतिपादन करना | उन्नीसवाँ सगे १८०-१८६

भ्रीरामचन्द्र जी के बाण से अपने पति के मारे जाने का हाल छुन तारा का त्रिलाप करना !

( )

वीसवाँ सगे १८६-१९२ शाककशिता तारा का विज्ञाप खुन ओर अड्भद के साथ के धन्य वानरियों का रोना |

इकीसपाँ सगे १९३-१९७ दुः्खाता तारा का हनुमान जी का धीरज वंधाना वाइसवों सगे १९७-२०४

जल वालि द्वारा सुग्रीव के राज्य शोर प्रडूद का ज्ञाना

तेइसवाँ सगे २१०४-२१ तारा का विलाप | चोवीसवाँ सगे २११-२२६

वाल के मारे ज्ञाने के वाद छुम्नीव का पश्चाचाप करना। रोती हुई एवं पति की तरह खबं भी मारे ज्ञाने की प्रार्थना करती हुई ताय के भ्रीरामचन्द्र जी का धीरज पंधाना | प्नीसवाँ सर्ग २२६-२३८ भ्रीरामचन्द्र जी के वचनों से सुश्नीव, तारा, अद्भदादि का दुःख दूर होना ओर उनके द्वारा वात्नि का दाहकर्मादि किया ज्ञाना | उब्बीसवाँ सगे २३८-२४६ सुग्रीव का राज्याभिषेक ओर भड्ढुद्‌ का युवराज बनाया जाता सत्ताइसवाँ सगे २४७-२५८ प्रस्नमणगिरि पर श्रीयमचर्ध जी का वर्षा ऋतु विवाना झर स्रीता जी का स्मरण करना तब सीता . के दुःख से

( )

दु/ज्नी श्रीरामचत्ध जो को लक्ष्मण को सम्रका बुक फेर प्रोत्घाहित करना

अद्वाइसवाँ सगे २५८--२७७ वर्षाम्रतु की शोभा का वर्णन | उन्तीसवाँ सगे २७७-२८५

भ्रीयमचन्द्र ज्ञी के प्रति की हुई प्रतिज्ञा का भून कर, स्त्रियों के साथ कीड़ा में रत छुप्नीव का हनुमान जी का प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये पेरणा करना। तद्नन्तर धीरामचन्द्र ली का काम पूरा करने के लिये, वानरी सेना एकत्र करने के लिये छुग्मीव का नील को श्राज्ञा देना | तीसवाँ सगे २८६-३०९ शस्दआठ वर्णन ओर श्रीयमचख्र जी का लक्ष्मण के सुप्रीव के पास याद दिलाने के लिये समझता तुा कर भेजना इकतीसवाँ सम ३१०-१२३ लक्मण का किकिन्धा में जाता ओर धड़द्‌ द्वारा सुत्ीव के पास अपने आगमन को सूचता सिजवाना वत्तीसवाँ सगे ३२३-३२८ हत्षुमान जी का सुप्रोव के सावधान करते हुए कहना कि तुम श्रीएमचन्द जी के किये डपकार के भूल कर अपनी प्रतिक्षा से च्युत हो रहे हो तेतीसवाँ सगे ३२५८-३४५ हुग में आये हुए लक्ष्मण के धनुष की टंकार का छुन, सुग्रीव का भयभीत होना ओर तारा से वातचीत करना |

( ) क्रोध में भरे लक्ष्मण का तारा का समक्काना बुझाना और जक्मण का छुप्नीव की राजसभा में प्रवेश करना | चौंतीसवाँ सर्ग ३४३६-३१५० .. लक्ष्मण का खुप्रीव का वहुत सा डउराना धमकाना पैतीसवाँ सगे ३५०-३५६ ) जत्मण के प्रति तारा का सान्वनाप्रद्‌ सम्भाषण | छत्तीसवाँ सगे ३५६-३६० तारा की बातचीत से लकत्तमण के क्रोध का शास्त होना घोर सुग्रीव से कहना कि, वस वहुत हुध्या श्रव तुम मेरे साथ यदाँ से श्रीरामचन्द्र जी के पांस चले सेतीसवाँ से ३६१-३६८ सुत्रीव की अक्षा से हनुमान जी का समस्त वानरों के घुलाना | अड्ठतीसवाँ सम ३६९-३७६ लकत्त्मण ज्ञी के साथ पालकी में वैठ सुत्रीव का श्रीराम- चन्द्र के पास आना उन्तालीसवाँ सग ३७६-३८५ क्िफिन्धा में समस्त मुख्य वानरों का अपने परिवारों के साथ समागम | चालीसवाँ सगे ३८६-४०१ वानरों के आज़्ाने पर; ये सव वानर वीर पआपके छधीन हैं आप इनके श्राक्षा दें ”--छुप्ीव का श्रीरामचन्ध ज्ञी से निषेदन करना तब श्रीरामचन्द्र जो का कहना कि, तुमका मेरा कार्य मालूम है, अ्रतः तु्हीं इनके 'उचित

( )

श्राज्ञा दो वव सुग्रीय का भिन्न भिन्न चानरसमूदों के भिन्न भिन्न दिशाप्रों में ज्ञने की आज्ञा देना |

इकतालीसवाँ सर ४०१-४१२ सुप्रीच का, दक्षिण दिशा में विशेष पराक्रमी एवं वल्ल- ' वान हनुमान अज्भदांदि का जाने की शआज्ा देना | व्यालीसवाँ सगे ४१२-४२५ पश्चिम दिशा में छुषेश के अधोन बानरों सेना का भेजा ज्ञाना ओर पश्चिम दिशा में हुढने योग्य स्थानों का खुप्तीव द्वारा सुषेण के प्रति च्णन किया ज्ञाना | तैतालीसवाँ सगे ४२५-४३९ उचर दिशा में चानर यूथपति शतवली के जाने की भ्राज्ञा देना ओर वहाँ के घुख्य मुख्य स्थानों का वर्णन चौवालीसवाँ सगे ४३९-४४३ सुप्रीव द्वारा उत्साहित किये ज्ञाने पर इनुमाव जी के उत्साहित देख पर्व उसके द्वारा काय की सिद्धि होती आन, सीता जो के। किवास कराने के क्षिये श्रोरामचन्ध जो का हनुमान ज्ञी के अपनी नामाड्ित अंगूठी का देना पैतालीसवाँ समे ४४३-४४७ सीतास्वेषण के लिये प्रस्यानोन्मुल वानर यूयपतियों द्वारा अपने अपने विक्रम का वखाव किया ज्ञाना छियालीसवाँ से ४४७-४५३ उुप्नोव द्वारा चानरयूथपतियों के समस्त भूमण॒डल् का री रहती हाल वतलाये जाने पर ओर उसे छुन श्रीराम- चन्द्र ज्ञीका विस्मित होना ओर सुश्रीव से पूछता कि,

( £ )

तुमकी इतना भूगो्र क्यों कर चिदित हुआ? उत्तर में छुप्मीव का कहना कि वालि से भयभीत हा मुझे अपने प्राण वचाने के लिये सारी एृथ्वों क्रा पर्यटन करना पड़ा था, इससे मुझे पृथ्वी के सम्रस्त स्थलों का वृत्तान्त अवगत है | कै 0 सेतालीसवाँ सगे ४५३-४५६ पूर्व, उत्तर एवं पश्चिम दिशाप्ों में गये हुए विनतादि चानर यूथपतियों का सीता का पता पाये चिना ही लौट कर था ज्ञाना | अड्तालीसवाँ सगे ४५६-४६१ कंरणडू नामक फिसी मुनि के शाप के प्रभाव से निज्जंन, निर्मल और वृत्तशून्य वियाचान में, खुरनिरभय नामक एक असछुर के साथ हनुमान धडुदादि का समागम | उसे रावण ज्ञान, भदज्भद्‌ द्वारा उसका वध विन्ध्यपव॑त की गुफाओों घाटियों ग्रोर उम्तके शिखरों के रक्ती रत्ती हृढ़ने पर भी सीता का पता चलने पर, वानरों का उत्साइमद् होना | उनचासवाँ सम ४६२-४६६ तब अडद के प्रोत्माहित करने पर चानरों का पुनः सीता की खोज के कार्य में प्रवत होना शोर विश्ध्यगिरि के दक्षिण वाले वन में पहुँचना पचासवाँ सगे ४६७-४७६ दिन्थ्यगिरि के दक्षिण भाग में घूमते किरते वानरों का ऋत्तविल् में प्रवेश ओर वहाँ एक दापसी से भेंट !

बज

इक्यावनवाँ सगे ४७६-४८० हसुमान ज्ञी का उस तापसी से उसका परिचय माँगना और उस अवृभुत विल का घृत्तान्त पूं छृना भोर तापसो का समस्त बृतान्त वतत्लाना ओर पपना परिचय देना बावनवाँ सर्ग ४८१-४८५ भ्रीदनुमाद का परिचय पाकर तापसी स्वयंप्रमा का अत्यन्त दृषित होना त्रेपनवाँ सगे ४८५-४९४ उस विल से वाहिर पहुँचा देने के लिये हनुमान जी को खयंप्रभा से प्रार्थना करना श्रोर धर्मचारिणी सुपयं प्रभा का उन सव को वात की वात में वाहिर पहुँचा देना | वाहिर पहुँच सीता का पता लगा सकने ओर पता लगाने के कांत्त की श्रवधि बीत जाने के काय्ण चानरों का श्रनशनत्रत धारण कर शरीर त्यागने के लिये तैयार होना। चौवनवाँ सगे ४९४-५०० . उत्साही हनुमान का अ्रडुद को प्रायोपवेशन करने के लिये समझ्काना वुकानां ओर प्रोत्साहित करना | पचपनवाँ सगे ५००-५०५ हनुमान जी के समझाने तुक्लाने पर भी अन्य वानरों के साथ घड्डूद का प्रायापपेशन करना अद्जद्‌ द्वारा लुप्रीव की निनदा किया ज्ञाना छण्नवाँ सगे ५०६-५०९ परायापवेशनत्नत धारण किये हुए बौनरों को देख वृद्ध सभपाति का अनायास भोजन प्राप्त हाने के लिये: हर्षित

( ९११ )

होना। श्रत्यन्त क्रूर शक्कु के सम्पाति के देख चकित वानरों का दुःखी होना दुःख प्रकंठ करते समय वानरों के मुख से अपने भाई जदायु की चर्चा छुन, सम्पाति का वानरों से भीतिपूर्वंक वातचीत करना सत्तावनवाँ सगे ५१०-५१५ सम्पाति के पू छने पर भड्गुद द्वारा जठायु की सत्यु, श्रीरामचन्द्र का वृत्तान्त, सीता का दरण, वानरों के प्राया- पवेशनादि का विस्तार पूर्वक तृत्तान्त कहा ज्ञाना | अद्वावनवाँ सगे ५१६-५२४ ' घड़दादि का दीन दुश्सी देख, सम्पाति द्वारा बानरों के सीता का पता बतलाया ज्ञाना। वानरों द्वारा सम्पाति के समुद्रतठ पर ते ज्ञाये जाने पर, सम्पाति का जठाबु के लिये जलाञअलि देना

उनसठवाँ सगे ५२४-५३० सम्पाति से जाम्बवान का यह पूछना कि, आपके सीता के हरे जाने का पता क्यों कर मालूम है उत्तर में सम्पाति का यह वतल्लाना कि मुझे अपने पुश्र खुपाश्बे द्वारा यद्द हाल मालूम हुआ | साठवाँ सगे ५३१-५३५ फिर सम्पाति का श्राक्षवृत्तान्त निरुपण करना शोर निशाकर मुनि के साथ सम्पाति की जे! वातचीत हुईं थी उसका वणन | इकसवपाँ सर्ग ५३५-५३५९ बानरों के साथ समागम होने पर नये पर निकलंगे * --इसका वृत्तान्त सस्पाति द्वारा वानरों से कद्दा जाना

( )

बासव्वाँ सगे ५३९-५४३ श्रीरामचन्द्र जी की सहायता के लिये आये हुए वानरों के दर्शन होने पर तुम्दारे पुनः पं निकल्ेंगे। निशाकर मुनि के इस बरदान का सम्पाति द्वारा बणेन। तेसठवाँ सगे ५४३-५४६ : निशाकर मुनि के वरदानानुसार सम्पाति के नये पंखों का जमना यह चमत्कार देख वानरों का द्विगुने उत्साह के साथ दत्नषिण समुद्रतठ पर उपस्थित दाना

चौंसठवाँ सर्ग ५४७-५५२ सागर की नाँधने के लिये सब वानरों का कोलाहल पैसठवाँ सगे ५५२-५५९ -

वानर यूथपतियों का आ्रापस में अपनी अपनो नाँधने की शक्ति का बतलाना | छियासठवाँ समे ५६०-५६८ जास्ववान का हनुमान जी को प्रोत्साहित करना, हनुमान नाम की व्युपपत्ति का वर्णन, हनुमान जो के शारीरिक बल का निरूपण, हनुमान जी के प्रभाव का वर्णन सरसठवाँ सगे ._ ५६८-५७९ वानरों द्वारा हनुमान जी की स्तुति, हनुमान जी का अपना पराक्रम प्रकट करना, लड्ग जाने के लिये हलुमान

जी का महंन्द्राचल पर्वत पर चढ़ना और उनका मनसा लड़ागमन |

इति

॥भीरभू.. रायणो क्र ६५ नि + श्रीमद्रामायणपारायणोपर्क्/

| पृ ले एापं+प नौढ--प्रनातनघम » अन्तगंत जिन पेदिकसम्पद्गायों में प्रीमद्रामायण का पारायण द्ोता है, उन्हों पम्प्रदायों के भनुवार उपक्रम और समापन कम प्रत्येक खण्ड के भादि भौर अन्त में क्रमशः दे दिये गये हैं। |

. श्रीवेष्णवसम्पदाय। ++ कूजन्त राम रामेति मधुर मधुरात्तरम्‌

शारुद्म कविताशाखाँ वन्दे वाब्मीकिकेकिलम्‌ 0

वाह्मी किम्रुनिसिदस्य कवितावनचारिणः श्ुयकराम झथानाद के याति पर्य गतिम्‌ पिवन्सतर्त रामचरितासतसा गरम

अतृप्तरुत मुनि वनन्‍दे प्राचेतसमकद्म पसत्‌

गेष्पदीक्वारोश मशक्रीकृत रात्ततम रामायशमहामाल्ारल वन्देपनिल्ात्मजम्‌

अस्षतानन्दवं वीर आनभ्रोशोकनाशनम्‌ - कपीशमत्तदनन्‍्तारं चन्दे लड्ाभयहुरम्‌ 5 मनाजव॑ मारततुल्यवेर्ग

जितेन्द्रियं बुद्धिम्तां वार्ठम्‌ | चातात्ज वा

श्रीरामदू्त शिरसा नमामि

( )

.'/ इल्लडुय सिन्धोः सलिलं सलोल॑ -7*” शाकवहि ज्वकामजायाः प्रादाय तेनेव दाद लड़ा नमामि त॑ प्राज्लतिराज्नेयम्‌

धराजनेयमतिपाठलानन काशनाद्विकमनीयविग्रहम पारिक्षावतसमूलवासिन भावयाप्रि पदमाननन्दनम्‌ ||

यन्र यत्र रघुनाथक्रीतन

तन्न तम कतमस्तक श्रम वाष्पवारिपसिृर्णलेचन

मारुति नमत रात्तसान्तकृम्‌ *

वेदवेदे परे पंसि आते दशरथात्मज़े | पेदः प्राचेतसादासीत्पात्नादामायशादक्मना १०

तदुपगतसम्रासस न्धियेर्ग सममधुरोपनतार्थवाकय वद्धम्‌ रुवरचरितं पुनिप्रणीर्त दशशिरसश्च पर्ध निशामयप्वम ११

धीराधव दशरथात्मज्ञमप्रमैय॑

सीतापति रघुकुल्ान्वयरत्नदोपम ध्राज्ञानवाइमरविन्द्दलायतात्ने राम निशाचरविनाशकरं नमामि १२

पेदेद्दीसहित॑ सुरहुमतते हैमे महामणठपे मध्येपुष्पकमासने मणिमये पीरासने छुब्यितम्‌

( ३)

झग्मे घाचयति प्रभश्चनखुते तरवे मुनिभ्यः पर ध्यूख्यए्तं भरतारिमिः परिवृत राम पन्ने श्याप्रतमु ॥१शो पर मगराध्यसम्पदाय!

शुक्षाग्वरधर विष्णु शगिवर्ण चतु्भृजम प्रसन्नवदन ध्यायेत्सवेषिष्नोपगान्तये लक्ष्मीनारायएं बनते तज़क्तपवरा हि य; श्रीमदानन्दतोी याख्यों गुरुस्त नम्माम्यहम्‌ पेदे रामायणे चैत्र पुराणे भारते तथा आदावन्ते मध्ये विषुः सर्वत्र गीयते सर्वविध्नप्रगमनं सर्वसिद्धिकरं परम सर्वज्ञीवप्रणेतारं वन्दे विन्ञयदं दरिम ॥| सर्वाभोश्प॒द राम॑ सर्वारिएनिवारकम्‌ जञानभोजानिमनिशं वर मद्गुदान्दितत घ्रम्मम॑ मद़॒रदितमजर्ड व्रिमलं सदा। झानन्द्तोथमतुल मजे तपत्रयापहम्‌ भवति यदनुभावादेइ्मु कै ६वि वाग्पी

जअडप'तरवि अन्तुजयते प्राक्षमौति: सकलवचनचेतोदिवता भाए्ती सा

मम चत्रप्ति वित्रत्तां सन्नित्रि मानसे ॥७॥ प्रिख्यासिद्ानतदुर््धन्तविध्यंपन विच तणः ज्ञवतीया ह्यतरणिभा वि्वां ता हृदसरे॥

( )

, बिन; पदेश्च गम्भोरेवक्यिम्निरखणिडतेः

: ग्रुरुभाव॑ व्यक्षयन्ती भाति भीजयतीयंवाकू॥ १॥

फूजन्तं राम रामेति मधुर मधुराक्षसम्‌ |

मआरहा कविताशा्सां के वाव्मीकिकेकितम्‌॥ १० (४ भास्म्ीकेश्तुनिसिहस्य कवितावनचारिणः | श्यवरमकथानादं के याति पर्य गतिम्‌॥ ११

॥: पिषन्‍्सततं रामचरितासुतसागरम्‌ अतृप्तरत प्रुनि वन्‍्दे प्राचेतलमकद्मषम्‌ १९

गाष्यदीक्ृषतवा रीश म्शकोकृतराक्षस+, शमायणमद्दाम्रालारत्न वन्‍्देप्रनिज्ञात्मजम १३

अज्जनानन्दनं दीर॑ जानकीशोफनाशनम्‌ | फपीशमत्तहन्तारं पन्‍्दे लड्डाभयड्रम्‌ १४॥ अ्रनाजव॑ मार्ततुल्यवेगं

लितेद्धियं बुद्धिमर्ता वरि्ठम्‌ पाताक्षज्ञ वानरधूथपुरूय॑

धीरामदूतंशरसा नमामि १४ ॥|

उल्लुय सिन्‍्धो! सलिल सल्ील॑

यः शोकवहि ज्ञनकात्मज्ञाया: गआादाय तेनैष ददाद लड़

नमामि त॑ प्राज्नलिराशनेयम्‌ | १६

आज्ञनेयमतिपाठलानन फाझनाद्रिकमनीयपिप्रहम्‌

(४५ )

पारिज्ञाततरुसूलवासिन॑ भावया मिं पतरमाननन्दनम्‌ १७

यत्र यत्न रघुनाथकीतेन॑

तन्न तन्न कृतमस्तकाश्नलिप्‌ वाष्पवारिपरिपूर्ण ल्ाचनं

मारुति नमत राक्षसान्तकम्‌॥ १८ वेद्वेये परे पुंसि जाते दृशरथाव्मजे बेद३ प्राचेतसादासीत्सा्ञाद्रामायणात्मनां १६

झापदामपहलततार दातार सर्वंसम्पदा म्‌। ज्लोकामिरामं श्रोरामं भूये! भूये। नमाम्यदेम॥ २० तदुपणतसप्ताससन्धियार् सममधघुरापनताथवाक्यवद्धम्‌ रघुवरचरितं पुनिप्रणीत दृशशिरसश्च वर्ध निशामयध्वम्‌ २९ वैदेद्दीसदित सुरुमतज्ने हैमे मदहामगणडपे मध्ये पुष्पकमाधने मणिमये वीरासने छुस्थितम्‌ झग्रे वाययति प्रभश्ननखुते तत्त मुनिभ्यः पर व्याख्यान्तं भरतादिभिः परिवृतं राम॑ भजे श्यामलम्‌ ४२२॥ वन्दे वन्‍्य॑ विधिभवभ्रदेन्द्रादिवृन्दारकेन्द्रे व्यक्त व्याप्त खगुणगणतोी देशतः कालतश्च धूतावयं खुलचितिमयेमंडुलैय्यक्तमज्ेः सानाथ्य॑ ने विद्धदृधिक अहम नाययणाख्यम्‌ ॥२३॥ भूषारत्न॑ भुवनवलयस्याणिलाश्चर्यरत्न॑ लीलारत्न॑ं जन्रधिदुदितुरदेवतामोत्रिग्लम्‌

( ) चिन्तारत्न ज्गति भजतां सत्सरोजयुरत्न॑ कॉसव्याया लसतु मम हन्मएडले पुत्ररत्वम्‌ २७ महांद्याकर णास्मेतरिमन्थमान समन्दर्म्‌ कवयन्ट रामकोर्च्या दनुमन्ततुवासदे २५ पुख्यप्राशाय भीमाय नमे! यरुप भ्ुत्रान्तरम्‌ नातावीरछुवर्दानां निर्रषाश्मायित्त वसा २६ स्वान्तस्थानन्तगय्याय पूर्णाज्ञानमद्ाणंसे उत्तुड्रवाक्तरद्भाय मध्वदुम्धाव्धये नमः || २७ वा्मोकेंगीः पुनीयान्नो मदीधरपदाश्रया। यददुग्ध उपञ्नीवन्ति कवयष्टणेक्का इव २८ घूक्तिस्त्लाकरे रम्ये मूलरामायणाणंपे विदरन्ता महीयां +: प्रीयस्तां गुरवोी मम | २६ एयप्रोच हयग्रीव हयग्रोवेति ये। वर्ेत्‌ तस्थ निःसरते वाणो जहुकन्याप्रचाइवत्‌ ३० नञ-+-॥ह-+ हे स्मातसम्पदाय। शुक्कासरधरं विषय शणिवर्ण चतु्भ जम सन्वदन ध्यायेत्सवविध्नोपशान्तये १॥ चागोशाद्या: सुमनसः सवार्थानाप्ुफक्रपे ये नत्वा छूतकृत्या। स्थुस्तं नमामि गजाननम्‌ २॥

देभिर्यक्ता चनुभिः स्मटिकम शिमयोमत्तमालां दधघाना * को हुं. हि [/ क् न" हरुतनेक्नेन प्र सितमपि शुद्ध पुएतक॑ चापरेण

( )

भासा कुन्देलुशडस्फदिक्मणिनिसा सासमानासमाना सा में वारेवतेयं निवध्तु चदने स्वदा छुप्रसज्ना ॥श॥

कूजन्तं राम रामेति मधुर मधुराक्तरम्‌ | झारद्य कविताशाणां के वाद्मोकिकोकिजम्‌

पाव्मी फ्ेपुतिमिहस्य कवितावनचा रिणः श्यवन्रमकथानादं के याति पर्य गतिम्‌ ५॥

यः पिवन्‍सतत्त रामचरितामृतसागग्म्‌ धतृप्तर्त मुनि वन्दे प्रावेतसमकद्मपम्‌

गैप्पदोक्तवारोाश मशक्रीकृनराक्षमम्‌ रामायएमदामा वार व्देपनितात्मजम ७॥

धखजनतानन्दूनं योर जानकीशोकनाशनम्‌ कपीशमचहन्तारं वन्दे लड्ढा|भयडुरम्‌ 5॥

उल्लइय सिन्‍्धोः लब्निलं सलीले

यः शाकवरड्धि जनकात्ममाया। आदाय तेनेव दृदाद लड़ा

नमामि त॑ं प्राञ्लिराजनेयम्‌

आश्रनैेयमनिपाठलतानन काश्नादिक्रमनोयविग्रदम्‌ | पारिज्ञाततस्सूलवासिन भावधांम प्रमाननन्दनम्‌ १०

यत्र यत्र रघुताथकोतनं नत्र तन्र कतमप्टकाब्जलिम्‌ |

है. 8.)

वाष्पधारिपरिपु्ण लेचनं भारति नमत राज्तसान्तकम ११ मनेजव॑ मास्ततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां चरिष्ठम्‌। बातात्मज वानरयूथमुख्य भ्रीरामदूर्त शिस्सा नमामि १२

यः कर्णाश्लिसस्पुटैरदरहः सम्यकूपिवत्याद्रात्‌ वात्मीकेवेंद्नार विन्दगत्नितं रामायणाख्य॑ मधु जवम्मव्याधिजराविपत्तिमरणैरत्यन्तसेपद्गव॑ संसार विद्यय गच्छृति पुम्रान्विष्णो: पद शाश्वतम्‌ ॥१२॥ वदुपगतसमाससन्धियेगं

सममधुरोपनताथवाफ्यवद्धम्‌ रघुवरचरितं घुनिप्रणीतं

दृशशिरसश्च वर्ध निशामयध्यम्‌ १४

वाह्मीकिगिरिसम्मूता रामसागरगामिनी पुनातु भुवन पुएया रामायणमद्दानदी १५

श्लोकसारसमाकीर्ण सर्मकल्लोत्रसड़लम्‌ काय्टग्राहमद्रामीन बनन्‍्दे रामायणाणंवप््‌॥ १६॥ वेदवेचे परे पुँंस आते वृशरथात्मज्े !

बेदः प्राचेतसादासीत्सा्षाद्रामायगात्मना १७ | वेदेद्दोलदितं सुरदुमतल्ने हैमे मद्ामण्डपे

मध्येपुष्पफमासते मणिमये वीरासने सुस्थितम

प्रग्ने वाचयति प्रभञ्ननछुते तस्व॑ मुनिभ्यः पर

व्याख्याग्त भरतादिभिः परिदृत राम मजे श्यामलम्‌ ॥१८)

( ९१ ]

वामे भूमिछुता पुरश्च हनुमान्पश्चात्सुमित्रासुतः शन्रुन्नी भरतश्च पाश्व॑ंद्लयेवाय्वादिकाणेषु सुप्रीवश्चः विभीषणएच युवराद्‌ तारासुता जामवान मध्ये नीज्षसरोज्कामलसूचि राम॑ सजे श्यामलम ॥१ शा

नमा5स्तु रामाय सलच्मणाय

देब्ये तस्ये ज्नकात्मजाये नमोषस्तु रद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो

नमोस्तु चन्द्राकमस्दुगणेभ्यः २०॥

अत

दिव्यामभिपिक्ताय सीतया

नगरीं

बराजराजाय रामभद्गाय

आताथ नग

मंगलम्‌

दर

राजा5ि

रशश

श्रीमद्राल्मीकिस मा कंस

2

किपण्किन्धाकाण्डः

सतां पृष्करिणीं गत्वा पद्मोत्तलमपाकुछाम रामः सोमित्रिसहितों विललापाकुलेन्द्रियः जव लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्र जी कमलों ओर मछलियों से 'युक्त पम्पा नाम की परम मनोहर भील पर गये, तब वे सीता का स्मरण कर विकल हो गये झोर विलाप करने लगे १॥ तस्य दृ्ट ता हर्षादिन्द्रियाणि चकम्पिरे | कामवशमापत्नः सोमित्रिमिदमत्रवीत्‌ किन्तु जव उन्होंने पम्पा सरोवर के अच्छी तरह देखा, तव ह॒ष में भर उनका शरीर काँप उठा ओर कामातुर दो वे लक्ष्मण जी से कहने लगे २॥ सोमित्रे शोभते पम्पा बैहर्यविमलोदका | फुछपश्मोत्पलवती शोमिता विविषेद्दु मेः

है लक्ष्मण ! देखो, पन्ने की तरह हरे रंग झोर स्वच्छ जल वाली इस पग्पा सरोवर की कैसी शोभा हो रही है। इसमें तरह तरह

) प्मोप्तलझ्षपाकुरला--कमलेन्द्रीवरमत्ये भाकुछां ( गो० )

किफ्िन्धाकायडे के कमल- ज़िल रहे दे ओर इसके चारों ओर खड़े नाना भाँति के वृत्त इसके सुशोमित कर रहे हैं सामित्ने पश्य पम्पाया! कानन॑ शझुभदशनम्‌ | यत्र राजन्ति शेलाभा दमा! सशिखरा इंव-॥ हे लक्ष्मण ! देखा, पम्पा के निकय्तर्ती चनों में श्टड्रयुक्त पर्वेत की तरह उचे ऊँचे पेड़ शोभायमान हो रहे हैं 3 मां तु शोकामिसन्तप्त॑ माधव; पीडयलिव | भरतस्य दु)खेन वदेल्या हरणेन ५॥ शोकातेस्थापि मे पम्पा शोभते चित्रकानना व्यवकीर्णा वहुविधे पुष्पे! शीतोदका शिवा मुझ शोकसन्तप्त के वसनन्‍्त पीड़ा सी दे रहा है। पक तो भरत जी का अयोध्यापुरी के वाहिर नव्दित्राम में रह कर बतो- पवासादि ऋर दुःख सहन करना, दूसरा सीता का हरण इनसे यद्यपि में अत्यन्त पीड़ित हैं; तथापि निविकार एवं शीतल जल वाली, अनेक प्रकार के पुष्पों से छुशोभित ओर विचित्र काननों से युक्त यह पग्पा कोल मुझे शोभायुक्त मालूम पड़ती दें नलिनेरपि संछन्ना दटयथ शुभदशना | सपव्यालानुचरिता मृगद्विनसमाकुला यह पग्पा कील कमल के फूलों से ढक्री हुई होने से देखने में बड़ी खुल्दर जान पड़ती हैं। इसके आस पास साँप अजगर घूमा

साधवो--वसन्तः | ( यो० ) भरतह्यदुध्खेव--मगराद द्वितंतोप वाततादि नियमक्ृतदुशखेब | ( गो० )

प्रथम: सर्गः

करते हैं ओर वनैले सुग आदि पशु तथा पत्ती इसके तठ पर खदा भरे खते हैं अधिक प्रतिभात्येतन्नीलपीत तु शाइलम | हरपाणां विविधेः पुष्प! परिस्तोमेरिवार्पितम्‌ यह भील नीले पीके तृ्ों से छुशोमित है भोर नाना। प्रकार के पुष्पों वाले बुत्तों से जो हाथी को रंग बिरंगी कूल को तरह ज्ञान पड़ते है, कैसी शोभायमान-हो रही है ८॥ पुपभारसमृद्धानि शिखराणि समनन्‍्तत; पे लताधि! पुण्िताआधिद्यगृहानि सतत! ९॥ देखो, ये बृत्त मिनकी फुनगियों फूलों के वोक से लदी हैं ओोर जो स्वयं चारों ओर से फूली हुई लताओं से लिपटे हुए हैं, इस पम्पा भील की शेभा वढ़ा रहे हैं सुखानिलो5्यं सौमित्रे कालः प्रचुरम्मय/र गन्यवा्सुरमिमाति जातपुष्यफलद्ुम/ १०॥ है लह्मण ! देखो, सुखदायक पतन सन्‌ सन्‌ करता वह रहा है। यद मधुनास कामोदीपक होने के कारण गवीत्रा सा हो रहा है। इस ऋतु मे दत्त, फूलों ओर फल्नों से भर जाते हैं १० पर॒य रूपाणि सोमित्रे बनानां पुषपशालिनाम | सता पुष्पवर्षाणि तेय॑ वेयम् ।मिव ११॥

दशक मम जप कानत पारा अर शमाकापाइएइि लक सा कक आई पलक ला नस परिस्तोमः कुबै; | (गी? ) प्रचुशमन्मथ१--का्मेद्वीपक (रा० ) गन्धवात __कामे।दीपनैनगर्बवान्‌ | (र०) सुरिमालों -सधुमात्तः (रा*)

98 किक्किन्धाकाणडे

हे लक्ष्मण ! पुष्पित वृक्तों से युक्त वनों का रूप तो देखे | वन के ये वृत्त ऐसी ही पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं, प्रानों वादल पानी की वर्षा कर रहे हों ११॥ प्रस्तरेषु रम्येपु विविधा। काननदुमाः ' बायुवेगप्रचलिताः पुष्पेरवकिरन्ति गास॥ १२॥ खुन्द्र पत्थरों के ऊपर उगे हुए नाना प्रकार के वृत्त पवन के वेग से काँप कर पृथिवी के ऊपर फूलों की वर्षा कर रहे हैं॥ १२॥ पतिते) पतमानेश्न पादपस्थेश्र मारुतः कुसुम! पश्य सोमित्रे क्रीडलिव समन्ततः १३॥

हे त्मण ! यह वसनन्‍त ऋतु का वायु, इन पुध्पों के द्वारा जो कुछ गिरे ओर कुछ गिरने को हैं ओर कुछ वृत्तों ही में लगे हैं, केसा चारों ओर खेल सा खेल रहा है॥ १३

विक्षिपन्विविधा) शाखा नंगानां कुसुमेत्कचा) मार्तथ्लितिस्थाने! पटपदेरनुगीयते १४ वायु चल्नने पर पृष्पों से लदी कत्तों की शाखाशों के साथ फूल भी हिलने लगते हैं। फूलों के हिलने से उन पर वैठे हुए भौरे फूलों का छोड़ गूंजने लगते हैं १४ मत्तफाकिलसन्नादेनतेयन्निव पादपान _शैलकन्दरनिष्कान्त: प्रगीत इव चानिल) १५ देखो, पहाड़ की गुफाओं से निकल कर वायु चृत्चों को नचाता

हुआ इन मतवाल्ी कोयलों के द्वार मानों मधुर गान कर रहा १९॥

|

प्रथम: सगः

तेन विश्षिपतात्ययं पवनेन समन्ततः अगी संसक्तशाखाग्रा ग्रथिता इव पादपा। १३६ पदन के चारों भोर से चलने पर वृत्तों को शाज्ाश्रों के परस्पर मिलन जाने से ये बुत माला को तरह गुये हुए से ज्ञान पड़ते हैं॥ १है॥ एप सुखसंस्पशी वाति चन्दनशीवल! गन्धपर्यावहन्पुण्यं श्रमापनयने।5निछ॒। १७॥ यद पवन सुखद्यशों, चल्दूव को तरह शीतल भोर शुद्ध गन्ध से युक हो, भ्रम का दूर कर रहा है॥ १७॥ अम्री पबनविक्षिप्रा विनदन्‍्तीव पादपा। पटपदेरनुकूमन्ता वनेधु मधुमन्धिषु १८ मधुगर्ध युक्त वनों में वायु से प्रेण्त यद बुत्तावली, भोंसों के गुंज्ञार द्वारा मानों नादू कर रही है १८॥ गिरिपस्पेषु रम्पेष पशपवद्धिर्मनारमे! संप्त्तशिखरा:' शैडा विराजस्ते महाहुमें! १९ पर्वतों के शिखरों पर उगे हुए सुन्दर पुधित वृत्तों की फुनंणियों के आपस में मिल ज्ञाने से पंत को शोमा ऐसी हो रंद्वी है, मानों पुष्पों का ढेर शोमित दी १६ पृष्पसंछन्नशिखरा मासतेस्क्षेपचअला) अग्मी मधुकरोचंसा; प्रगीता इव पादपा। २०

3... ननमीननिनननननननननानाणन।खज जज “[:“7“7“77““““*“__*““+ _ ल्‍ख28लणत7777

? संप्क्त शिक्वराः--परक्षरप्ंलिष्टामा। ( गो ) «

किपफ्किन्धाकारडे

वृत्तों की फुनगियाँ पुष्पों से ढक ज्ञाने से तथा उनके ऊपर . भौंरं के गुंजार करने से शोर पवन के क्ोकों के लगने के कारण धृत्तों के हिलने से ऐसा जान पड़ता है, मानों पेड़ गा नाच रहे हैं॥२०॥

पुष्पिताग्रांस्तु पश्येमान्कर्णिकारान्समन्ततः | हाटकप्रतिसंछन्नानरान्पीताम्बरानिव २१

हे लक्ष्मण ! चारों ओर खड़े इन फूले हुए कणिकार (कनैर) के पेड़ों को तो देखे। मानों खुबर्ण के पआाभूषण पहिने हुए ओर पीतामवर धारण किये हुए मनुष्य खड़े हों ॥२१॥

अय॑ वसनन्‍्तः सोमित्रे नानाविहगनादितः सीतया विप्रहीणस्य शोकसन्दीपना मम्र २२

हे लक्ष्मण | यह वरुन्त ऋतु विविध प्रकोर के पत्तियों से नादित हो, मेरे सीता-वियेग-जन्य शोक को वढ़ा रहा है २२

मां हि शोकसमाक्रान्तं सन्‍्तापयति मन्मथः | हषट प्रवदमानश्र मामाहयति केकिल) २३

' शोक से सन्तापित मुक्तका यह कामदेव ओर भी भधिक सन्तप्त कर रहा है घोर प्रसन्न दो कूकती हुई कायल मात्रों मुझ्े ललकार रही है २३

एप नत्यूहके हषो रम्ये मां बननिभरे प्रणदन्‍्मन्मथाविष्टं शोचयिष्यति लक्ष्मण | २४

देखे लक्मण ! जान पड़ता है कि, मनारम वन के भरनों के

तठ पर वैठा हुआ जलकुक्कुठ, हर्षित हो, अपने शब्द से मुझ ., कामातुर के विकल कर देगा॥ २४

प्रथमः सगः

श्रुल्वेतस्य पुरा शब्दमाभमस्था मम प्रिया | मामाहुय प्रमुदिता परम॑ प्रत्यनन्द्त | २५॥ मेरी प्रिया सीता, आश्रप्त में इसकी वेज्नी छुत ओर प्ुकको बुला कर ग्रत्यानन्द्ति दिती थी २४ एवं विचित्रा।. पतगा नानारावविराविण! वक्षणुर्मछता। पश्य सम्पत्ति ततस्ततः २६॥ ये तरह तरह के अद्भुत पत्ती भाँति भाँति की वेलियाँ वालते हुए चारों श्रोर से कर वृत्तों, गुल्मों भ्रोर ल्ञताशं पर गिरते हैं॥ २६ विमिश्रा विहगाः एम्मिरात्मव्यूहामिनन्दिता। | भुज्नराजप्रमुदिता सोमित्रे मधुरखरा। २७॥ है लदपण | भाँति भाँति के (नर झोर मादा! पत्तियों के जोड़े अपने समुदायों में श्रानन्द्त दो रहे हैं ओर देखे भूड्राज पत्ती प्रसन्न हो, कैसी प्यारी बेल्ली वाल रदा है २७ तस्या; कूले प्रमुदिता) शकुना। सह्ृशरित्विह | नत्यूहरुतविक्रन्देः पुंस्केकिलरतैरपि २८ देखे पम्पा के तद पर पत्तियों के समूद्द के समूह, दात्यूह पत्ती तथा नरकायल की बेलियाँ सुन कैसे प्रसन्न हो रहे हैं ९८॥ सनन्ति पादपारचेमे ममरानजूगदीपना: अशोकस्तवकाज्ञार: पटपद्खननि/खन। २९

देखा, ये सव पेड़ भी वाल रहे हैं। ज्िसले मेरा काम उत्तेजित होता है और गुंजार करते हुए भोंरों से भरा यद अशोक के

किफ्िन्धाकाणडे हि

पुष्यों का गुच्दा मुक्ते दृहकते हुए अगार की तरह मालूम पड़ता है॥ २६

मां हि पहुवताम्रार्थिवंसन्ताम्िः प्रधक्ष्यति

हि ता सक्ष्मपक्ष्याक्षी सुकेशी मृदुभाषिणीम्‌ ३० अपश्यते मे सोमिग्रे जीवितेडस्ति प्रयोजनम्‌

अयं॑ हि दयितस्तस्या। कालो रुचिरकानन! | ३१॥

दे लक्रमण ! यह वसन्‍्त ऋतु रूपी आग, जिसमें लाल लाल पत्रे रुपी ज्वाला उठ रही है, मुझे मानों भप्म कर डाक्ेगी। उस कमलनयनी, सुकेशो ओर मधुरभाषिणी के देखे विना मेरा जीना व्यर्थ है क्योंकि मेरी प्यारों का यह ऋतु बहुत ही प्यारी लगती है॥३० ३१॥

काफिलाकुलसीमान्ता दयिताया ममानघ मन्मथायाससम्भूते वसन्तगुणवर्धित) ३२

अयं मां धक्ष्यति प्षिपं शोकामिन चिरादिव

अपश्यतस्तां दयितां पश्यते! रुचिरदृमान्‌ र३

॥ै दे देषरदित | यह समय जिसमें चारों ओर से कायल की कुह कुद्दू छुन पड़ती है मेरी प्रिया को वहुत पसन्द है | मदन की भय- जनित शोक रूपो आग, जे। वसन्‍्त के रमणोीय गुणों से अधिक वढ़ रही है, मु्े थोड़ी ही देर में वहुत ज्ञलू भस्म कर डाक्षेगी क्योंकि यह सुन्दर वृत्त तो मुझे देख पड़ते हैं ; किन्तु प्यारी सोता मुझे नहीं देख पड़ती ३५॥ ३३ |]

प्रथम: सर्गः "है

मपायपात्मप्रभवे! भूयरत्वस्मुपयास्यति | » >,। अदृश्यमाना बेदेही शोक वर्धयते मम ३४ झतः कामदेव ओर भी बढ़ेगा। इस समय सीता का भेरे पास होना मेरे शोक को अधिकाधिक वढ़ा रहा है ३४ दृश्यमाना वसन्तभ स्वेदसंसर्गदूषकः | मां ह्थ शुगशाबाक्षी चिस्ताशोकबलात्कृतम्‌ ३५॥ यह रति की थरावद दूर करने वाला वधन्त, मेरे सामने था ओर उस सुगनयनी, चिन्तावती ओर शोकपूर्ण, के सामने ने होने से,मुझ्के वहुत दुःख्ी कर रह्य है ३४ सन्तापयूति सोमित्रे ऋरचेत्रो वनानिल! . अमर मयूरा! शोभन्ते प्रवृ्मन्तस्ततस्ततः २६ चर नि बज पक स्व! पक्ष! पवनादधुतैगवाश्षेः स्फाटिकेरिव शिखिनीभिः परिवुतास्त एते मदगूछिता; || २७ है लद्ट्मण ! यह चैत्र का क्रूर वन-वायु भी मुझे पीड़ित करता है। देखा ! ये मार नाचते हुए इधर उधर शोभायमान दो रहे हैं।

वायु से कम्पायमान इनके पंख ऐसी शोमा दे रहे हैं; मानों स्फठिक के बनाये हुए करोले हों। ये समस्त मे।र अपनी मे।रनियों से घिरे

हुए उन्मत्त से हो रहे हैं ३६ २७॥ मन्मथामिपरीतस्य३ मम मन्मयवधना: | पश्य लक्ष्मण चृत्यन्तं मयुरसपत्चत्यति ३८ आत्मप्रमवः--मन्मथः ( गो० ) भूयर्त्वं--प्रवृद्धकवं | ( रा* ) अमिपरोत&य--न्याप्तत्थ ( रा० )

डी

१० किफ्िन्धाकाणडे

शिखिनी मन्मथातेंपा भतार गिरिसानुपु तामेव मनसा" राम्रां? मयूरोप्युपधावति ३९ ये मोर स्वयं कामरेव से व्याप्त दो मेरे काम के उत्तेज्ञत कर रहे हैं। देखा लच्मण ! इस पर्वत की चांदी पर मे।र के नाचते देख कर, यह मोरनी कामदेव से पीड़ित हो, अपने पति के साथ नाच रही है ओर वह अपने पति के पास ज्ञाना चाहती है ३८॥ ३६ .. वितत्य रुचिरों पक्षो रुतैरुपहसब्निव | भयूरस्य बने नून॑ रक्षसा हता प्रिया | ४० मोर अपने छुन्दर दोनों पंख़ों के फैला कर और प्यारी वाली वाल मानों मेण उपहास करता है। इस मार की मेरनी के कोई रातज्त्स पकड़ कर के नहों से गया ४० तस्मानुत्यति रस्येपषु वनेषु सह कान्तया | मम त्वयं बिना वास; पुष्पमासे सुदु!सह! ४१ इसोसे तो यह इस रमणीय दन में अपनी प्यारी के साथ नाच रहा है | हे लक्ष्मण ! इस चैत्र मास में सीता के बिना मेरा यहाँ रहना दुश्सह है ४३ पश्य लक्ष्मण संरागं तियग्येनिगतेष्वपि | यदेषा शिखिनी कामाद्भतारं स्मतेडन्तिके ४२॥

.. मन्सा उपधावीत--समीपसागन्तुमिच्छततीस्यर्थ: (यो०) रामा-- कान्तां | ( गो०

प्रथम: सर्ग;

कह है लक्ष्मण | पशु पत्तियों में भी प्रेमाशुगाग पाया ज्ञाता है। ये मेरनियाँ काम से पीड़ित हो भोरों के पास कैसी दोड़ी चली ज्ञांती हैं ४३ ममाप्येद॑ विशाल्ाक्षी जानकी जातसम्भमा | मदनेनाभिवर्तेत यदि नापहुता भवेत्‌ ४३ यदि मेरी उस विशाल्ाक्षी ज्ञानकी के रात्तस हर कर ने गया होता, तो वह भी कामपीड़ित हो, मेरे पास थाने की इच्छा करती ४३ पर्य लक्ष्मण पुष्पाणि निष्फलानि भवस्ति मे | पुप्पभारसगृद्धानां वनानां शिशिरात्यये' ४४ देखे लक्ष्मण ! इस वसन्‍्त ऋतु में चन के सब पुणित वुृत्तों के फूल, मेरे लिये किसी काम के नहीं ४४ रुचिराण्यपि पुष्याणि पादपानामतिश्रिया निष्फलानि महीं यान्ति सम॑ प्रधुकरोत्करे ४५॥ तृत्तों के शोभारुपो ये फूल जे भ्त्यन्त छुरद्र हैं, भोरों के झुणडों के साथ साध पूथिवी पर गिर कर निष्फल हुए जाते हैं ४४ वदन्ति राव॑ मुदिताः शकुना। सहुश। कलस्‌ | आहयन्त इवास्येन्यं कामेन्मादकरा मम || ४६ ये पत्तियों के समूह द्प से चहकते भर पक्क दूसरे के लत्ञका- रते मेरे काम की उन्परादावस्था की वृद्धि कर रहे हैं ४६

दशिक्षिराद्यये--असन्ते ( गो )

१२ किफिन्धाकायडे,

वसन्तों यदि तत्रापि यत्र मे वसति प्रिया | नून॑ परवशा सीता साउपि शोचलहं यथा | ४७ इस सम्य जहाँ मेरो प्यारी सीता होगी, यदि वहाँ भी वसन्त हुआ, ते वह भी परचेश हो, मेरी तरह शोक कर विकल द्ोतो होगी ४७ नून॑ तु वसन्‍्तो<य॑ देश स्पृशति यंत्र सा कर्थ हसितपश्माक्षी वर्तयेत्सा मया विना॥ ४८ निश्चय ही जहाँ पर सीता देगी वहाँ वसनन्‍त ऋतु का नाम निशान मो दोगा। नहों तो वह कमलनयनो मेरे विना वहाँ कैसे रह सकती थी ४८ अथवा वतते तत्र वसन्‍्ते| यत्र मे प्रिया | कि करिष्यति सुभ्रोणी सा तु निर्भत्सिता परे! ॥४९॥ ओर यदि जहाँ पर भेरी प्यारों है वहां भी वसनन्‍्त ऋतु हुआ, ते वह खुओओोणी दूसरों से डराई धमकाई जा कर, क्या करती होगी ४६ श्यामा पद्पलाशाक्षी शदुपूवाभिभाषिणी | नून॑ वसनन्‍्तमासाथ परित्यक्ष्यति जीवितम्‌॥ ५०

श्यामा, कम्लनयनी शोर सुदुभाषण करने वाली सीता

इस वसनन्‍्त ऋतु के आने पर निश्चय ही अपने प्राथ गंवा देगी ५०

छह हि ह्द्ये बुद्धिमेम सम्भति वर्तते नाले वतेयितू सीता साध्वी महिरिहं गा ५१॥

प्रथमः सगेः १३

इस समप्रय इस वात का ते मुझे इृढ़ विश्वास है कि, मेरे वियेग में सीता कभी ज्ञीदित नहीं रह सकती ५१॥ मयि भावस्तु' वेदेल्नास्तत्त्वते विनिवेशितः | सौतायां रे प्रमापि भाव! सीतायां स्वथा विनिवेशित) ५२॥ क्योंकि मेरे मन में सीता का भोर सोता के मन में मेरा पूर्ण ओर यथार्थ अनुराग है ५२॥ एप पुष्पवहे वायु! सुखर्पशों हिमावह! वां विचिन्तयत) कान्‍्तां पावक्रतिसेर! मम || ५३ यह शीतल मर्द छुगन्ध वायु सीता के लिये चिम्तातुर, मुक्का भ्रम्मि की तरह सन्तापकारी है॥ ५३ ॥| सदा सुखमहं मन्ये य॑ पुरा सह सीतया | मारुतः विना सीतां शोक वर्धयते मम ५४ जिस पवन के पहले में सीता कै साथ रहते समय अत्यन्त खुख- कारक मानता था, वहो वायु इस समय सीता के विना मेरा शोक बढ़ा रहा है ५४ तां बिना बिहड्े यः पक्षी प्रणद्तिस्तदा रे वायसः पादपंगत! प्रहष्टमिनदेति ५५ जब सीता जी पास थीं तव इस क्ैए ने आकाश में उड़ शोर कठोर बाली बेल, जानकी के वियोग की छूचना दी थी। इस समय यह पत्ती प्रसन्नता से उड़ कर बृत्त पर वैठ फिर उनके (सोता के) मित्नन के। ज्ञता रहा है ५५

सावे।$नुराग: (गो?) पावकप्रतिमा--सन्तापकर इत्यथ:। (यो०)

१४ किफ्किन्धाकाणडे

एप वे तत्र वेदेशा विहगः प्रतिहारक। पक्षी माँ तु विशालाहया! समीपमुपनेष्यति ५६ मुझे मालूम पड़ता है कि, यह कोआ मुझे सीता का सन्देशा दे रहा है थोर यह मुझे उप विशाल्रात्ञों के पा पहुँचावेगा *६ शृणु लक्ष्मण सन्नादं बने मद्विवर्धनम्‌ पुष्पिताग्रेषु द॒क्षेप हििजानामुपक्ूजताम्‌ ॥। ५७ |। लह्मण छुनो | इन फूली हुई बरत्तों को शाखाओं पर बैठे हुए पत्तियों का चहकना मेरी क्ामवासना के वढ़ा रहा है ५७ विक्षिप्तां पवनेनेतामसों तिलकमझरीमू पटपुद। सहसा5म्येति मदेदूधूतामिव प्रियाम्‌ ५८ देखे यह भोरा पवन चाल्षित इस तिलक बुत्त फो जता पर कैसा शीघ्र जा कर मंडरा रहा है, मानों केई मतवात्ना अपनो प्यारी के पास ज्ञाय ४८ || कामिनामयमल्न्तमशोक! शेकवर्धन! क्र पु है] छः स्तवके! पवनोक्तिप्रेस्तजयन्निव मां रिथित; ५१९ यह अशोक का पेड़ कामीजनों के शोक का बढ़ाने वाला है। यह पचन से कम्पित हो अपने पत्तों से मानों मुझका डरवाता हुआा खड़ा है ५६ अमी लक्ष्मण हृ्यन्ते चूताः छुसुमशालिन/। विश्वमेत्सिक्ततनस! साद्वरागा नरा बे ६० , हैं लत्मण ! थे बोरे हुए आम के दुत्त पेसे देख पड़ते हैं, मानों *०५ “गराग | चन्दनादि ) के लगाये हुए काप्ोन्मत्त मसुष्य हों ६०

# लक श्र

प्रथमः सगगः १४

सोमित्रे पश्य पम्पायाश्रित्रासु बनरामिपु। किन्नरा नरशादूल विचरन्ति ततस्ततः ६१ है जद्यण ! इस पम्पासरोचर के तटवर्ती विचित्र चन में किन्नर लग इधर उधर कैसे धूम फिर रहे हैं ६१॥ इमानि शुभगन्धीनि पहय लक्ष्मण सबंशः | नलिनानि प्रकाशन्ते जले तरुणसूयवत्‌ | ६२ है लद्भण ! देखा, इस समय पम्पासरावर के जज्ष में ये सुगन्ध युक कमल के फूल तझ्ण सूर्य्य को तरह कैसे चमचमा रहे हैं ॥६२॥ एपा प्रसन्नसलिला पम्मनीलेपपलायुता | हंसकारण्दवाकीणा पम्पा सोगनस्थिकानिता ) ३३ देखे यह पम्पा नाम की भील, भाँति भाँति के खुगन्ध युक्त कमल्-पुष्पों से तथा हंस भर कारण्डव पक्षियों से केसो खुदर जान पड़ती है ६३ जले तरुणसूर्यामे! पटपदाइतकेसरी | पडूजे! शेमते पम्पा समस्तादभिसंडता ६४ चक्रवाकयुता नित्य॑ चित्रपस्थवनान्तरा | मातड्भमगयूयेश्व शोधते सलिलार्थिमि! ६५ इस पण्पा के वग़ल्ल वाल्ते विचिन्न बन, चक्रवाकों के झुणडों से तथा पानी पीने के अभिलाषो सुयों ओर हाथियों के दल्वों से युक्त दो कर कैसे शोमित हो रहे हैं ६४ ६५ पवनाहितवेगाभिरूमिमिर्विगलेआभसि | पड्ूजानि विराजन्ते ताब्यमानानि लक्ष्मण ॥६६॥

१६ किष्किन्धाकायडे दे लक्ष्मण ! देखे वायु के फोकों से उठी हुई लगें के छद्दराने से यह कमल के फूल कैसे अच्छे मालूम देते हैं ६4 प्नपत्रविशालाक्षीं सततं पडूजप्रियाम्‌ | अपश्यते मे बेंदेहीं नीवितं नाभिरोचते || ६७ कमलात्ती जानकों को, जिसका क्रमत्न पुष्प अत्यन्त प्रिय - हैं, देखने से मुझे श्रपना ज्ञीवित रहना भी अच्छा नहीं जान पड़ता ६9 अह्दे कामस्य वामत्व॑ यो गतामपि दुल भाम्‌ स्मारयिष्यति कल्याणी कल्याणतरवादिनीम || ६८ है लक्ष्मण |! ज़रा कामदेव की वामगति के तो देखे। ज्ञिसका वियोग हो चुका है झोर जिसका फिर मिलना भी अति दुलंभ है, उसी शुभ वचन वोलनेवाली कद्याणी का, यह वार वार स्मरण कराती है ई८॥ शक्ये! धारयितुं कामे! भवेद्यागते' म्या | यदि भूये वसन्तो मां हन्यात्युष्पितदुम! ६९ || , यदि पुष्पित छुत्षों चाला यह चसन्‍्त घुक्के सतावे, तो में इस समय काम के वेग के भी रोक सकता हूँ ६६ यानि सम रपणीयानि तया सह भवन्ति मे तान्येवारमणीयानि जायम्ते मे तया बिना ७०

देखे सोता के पास रहने पर मुझे जो पदार्थ प्रिय लगते थे वे उसके बिना मुक्ते अब फीके जान पड़ते हैं ७०

) अद्यागत/+--इदानों वर्तमान: ( यो० )

प्रथमः सर्गः १७

प्धकेशपलाशानि दृष्ठा दृष्टिहि मन्यते ेु सीताया नेत्रकेशाभ्यां सदशानीति छक्ष्ण ७१॥ . है लत्मण | मेरी निगाह में इन कमलपन्नों का बड़ा शादूर है| क्योंकि ठीक ये सीता की श्ांत्ों के कोयों के समान देख पड़ते हैं ७१ पश्मकेसरसंसष्ठो हृक्षान्तरविनि!सत! ।. , निःश्वास इव सीताया वाति वायुमेनेहर! ७२ कमल के फूलों की केसर की सुगन्धि ,से मिला ,हुआ और , थत्य वृत्तों के वीच हो ऋुर चलने वाला, यह मनेहर-पवन सीता के निभ्वास के तुल्य वह रहा है 9२॥ सौमित्रे पश्य पम्पाया दक्षिणे गिरिसानुनि पुष्ितां कर्णिकारस्थ यहि' परमशोभनाम्‌ ७३ दे लक््मण ! पम्पा को दक्षिण भोर देखो | वहाँ परवेत- शिखर पर कर्णिकार की फूली हुई लताएं कैसी मनोहर देख पड़ती है ७३॥ . अधिक शैलराजो<्यं धातुभिः सुविभूषितः विचित्र सुजते रेणं वायुवेगविघट्ितम्‌ || ७४ प्रनेक धातुओं से विभूषित यह.पर्व॑वराज तेज्ञ वायु के चलने ' से कैसी विचित्र घूल उड़ा' रदा है ७४.॥ गिरिपस्थास्तु सोमित्रे सबंतः संप्रपुष्पितिः। निष्पत्रे! सबंते*रम्ये) -अरदीप्ता इव किशुके!॥ ७५॥

यहिं--छतां। (गो० ) + ६४६ बा० रशा्‌० कि०--२

१८ न्‍ किफ्िन्धाकाणडे

हे लक्ष्मण ! इस पर्वत के शिखर चारों ओर से फूक्ते हुए तथा फ्तों से रहित देख के पेड़ों से युक्त ऐसे ज्ञान पड़ते हैं, मानों प्ेत में आग लग गयी हो ७५ पम्पातीररुह्ाइचेमे संसक्ता मधुगन्धिन। मालतीमल्िकापण्डा) करवीराश्च पुष्पिता; ७६ केतक्यः सिन्धुवाराश्च वासन्त्यश्च सुपुष्पिताः माधव्यों गन्धपूर्णाईच इुन्दगुत्माइच स्वेज्। ७७॥ चिरिविल्वा मधूकाश्च वच्चुा वकुलास्तथा। चम्पकासितिलकाइचेव नागहक्षा) सुपुष्पिता।॥ ७८ नीपाश वरणाइचैव खजूराश्र सुपुष्पिता) पत्नकाश्वापशोभन्ते नीलाशोकाइच पुष्पिता। ७९ लेप्राश्य गिरिपृष्ठेषु सिहकेसरपिज्रा। अड्ोलारच क्ुरण्टाश्च पृर्णका; पारिभद्रका! ८० चूता; पादलयश्चेव केविदाराश्च पुष्पिताः झुचुलिन्दाजुनाश्वैव दृश्यन्ते गिरिसाजुषु ८१॥ केतकाहलकार्चेव शिरीषा) शिंशुपा धवाः शास्मल्य; किंशुकाश्चेव रक्ता। कुरवकारतथा ८२॥ तिनिशा नक्तमालाइच चन्दना! स्पन्